📿 श्लोक संग्रह

तेषामहं समुद्धर्ता

गीता 12.7 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 12 — भक्तियोग
तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् ।
भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम् ॥
तेषाम्
उनके लिए
अहम्
मैं
समुद्धर्ता
उद्धार करने वाला
मृत्युसंसारसागरात्
मृत्यु-रूपी संसार-सागर से
भवामि
होता हूँ, बन जाता हूँ
न चिरात्
शीघ्र ही, देर नहीं लगाता
पार्थ
हे अर्जुन
मयि
मुझमें
आवेशितचेतसाम्
जिन्होंने अपना मन लगाया है

यह 12.6 का सीधा जवाब है। जो भक्त सब कर्म कृष्ण को सौंप देते हैं और अनन्य भाव से ध्यान करते हैं — कृष्ण कहते हैं — उनके लिए मैं स्वयं मृत्यु और संसार के इस सागर से उद्धार करने वाला बन जाता हूँ। और यह जल्दी करता हूँ — देर नहीं लगाता।

'न चिरात्' — यानी शीघ्र। यह शब्द बहुत प्यारा है। जैसे एक दादा अपने पोते की पुकार सुनते ही दौड़ पड़ते हैं, वैसे ही कृष्ण भक्त की पुकार पर देर नहीं करते।

यह 12.6-7 के जोड़े का दूसरा और अंत्य भाग है। 12.6 में भक्त की भक्ति का वर्णन था, 12.7 में कृष्ण का वचन है — मैं उनका उद्धार करूँगा। यह जोड़ा पूरे भक्तियोग का केंद्रीय आश्वासन है।

परंपरा में इस श्लोक को 'कृष्ण की प्रतिज्ञा' के रूप में देखा जाता रहा है। 'मृत्युसंसारसागरात्' शब्द संसार की विशालता और गहराई दिखाता है — और कृष्ण उससे शीघ्र पार उतारने का वचन देते हैं।

अध्याय 12 · 7 / 20
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