यह 12.6-7 के जोड़े का पहला श्लोक है। कृष्ण यहाँ उन भक्तों का वर्णन करते हैं जो अपने सब कर्म कृष्ण को अर्पण कर देते हैं, कृष्ण को ही अपना परम लक्ष्य मानते हैं, और अनन्य भाव से, बिना किसी और की ओर देखे, कृष्ण का ध्यान करते हैं।
तीन बातें — कर्म-अर्पण, मत्पर (कृष्ण ही लक्ष्य), और अनन्य योग। जैसे एक माँ अपने बच्चे के लिए जो भी करती है, वह सब उसी एक के लिए होता है — उसका मन कहीं नहीं भटकता। वैसे ही यह भक्त अपना सब कुछ कृष्ण पर छोड़ देता है।