📿 श्लोक संग्रह

ये तु सर्वाणि कर्माणि

गीता 12.6 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 12 — भक्तियोग
ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि सन्न्यस्य मत्पराः ।
अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते ॥
ये तु
परंतु जो
सर्वाणि कर्माणि
सब कर्मों को
मयि
मुझमें
सन्न्यस्य
अर्पण करके, समर्पित करके
मत्पराः
मुझे ही परम लक्ष्य मानने वाले
अनन्येन
अनन्य, बिना किसी और के
एव
ही
योगेन
योग से, साधना से
माम्
मेरा
ध्यायन्तः
ध्यान करते हुए
उपासते
उपासना करते हैं

यह 12.6-7 के जोड़े का पहला श्लोक है। कृष्ण यहाँ उन भक्तों का वर्णन करते हैं जो अपने सब कर्म कृष्ण को अर्पण कर देते हैं, कृष्ण को ही अपना परम लक्ष्य मानते हैं, और अनन्य भाव से, बिना किसी और की ओर देखे, कृष्ण का ध्यान करते हैं।

तीन बातें — कर्म-अर्पण, मत्पर (कृष्ण ही लक्ष्य), और अनन्य योग। जैसे एक माँ अपने बच्चे के लिए जो भी करती है, वह सब उसी एक के लिए होता है — उसका मन कहीं नहीं भटकता। वैसे ही यह भक्त अपना सब कुछ कृष्ण पर छोड़ देता है।

यह श्लोक 12.5 के बाद आता है। 12.5 में कृष्ण ने कहा कि निर्गुण मार्ग कठिन है। अब 12.6-7 में वे सगुण भक्त का स्वरूप और उसे मिलने वाले आश्वासन की बात करते हैं। यह जोड़ा पूरे अध्याय का भावनात्मक केंद्र है।

परंपरा में इस श्लोक को 'कर्म-अर्पण भक्ति' का आधार माना जाता रहा है — जहाँ भक्त कोई कर्म अपने लिए नहीं करता, सब कुछ ईश्वर को सौंप देता है।

अध्याय 12 · 6 / 20
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