कृष्ण यहाँ एक सच्ची बात कहते हैं — जिनका मन निराकार, अव्यक्त ब्रह्म में लगा है, उनके लिए परिश्रम बहुत अधिक है। यह मार्ग शरीरधारियों के लिए बड़ी कठिनाई से प्राप्त होता है।
कारण सरल है। हम जिस संसार में रहते हैं, वह नाम और रूप का संसार है। बच्चा माँ का चेहरा देखकर पहचानता है, नाम सुनकर पहचानता है। जो निराकार है, उसे पकड़ना मन के लिए बड़ा मुश्किल होता है। इसीलिए सगुण भक्ति — जिसमें रूप है, नाम है, प्रेम है — शरीरधारी मनुष्यों के लिए स्वाभाविक और सुगम है।
यह श्लोक किसी मार्ग को कम नहीं बताता — यह केवल शरीरधारी जीव की स्वाभाविक सीमा की बात करता है।