📿 श्लोक संग्रह

क्लेशोऽधिकतरस्तेषाम्

गीता 12.5 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 12 — भक्तियोग
क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम् ।
अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते ॥
क्लेशः
कष्ट, परिश्रम
अधिकतरः
बहुत अधिक
तेषाम्
उनके लिए
अव्यक्तासक्तचेतसाम्
जिनका मन अव्यक्त में लगा है
अव्यक्ता
निराकार, अव्यक्त
हि
निश्चित रूप से
गतिः
मार्ग, पहुँच
दुःखम्
कठिनाई से, दुःखपूर्वक
देहवद्भिः
देह धारण करने वालों द्वारा
अवाप्यते
प्राप्त की जाती है

कृष्ण यहाँ एक सच्ची बात कहते हैं — जिनका मन निराकार, अव्यक्त ब्रह्म में लगा है, उनके लिए परिश्रम बहुत अधिक है। यह मार्ग शरीरधारियों के लिए बड़ी कठिनाई से प्राप्त होता है।

कारण सरल है। हम जिस संसार में रहते हैं, वह नाम और रूप का संसार है। बच्चा माँ का चेहरा देखकर पहचानता है, नाम सुनकर पहचानता है। जो निराकार है, उसे पकड़ना मन के लिए बड़ा मुश्किल होता है। इसीलिए सगुण भक्ति — जिसमें रूप है, नाम है, प्रेम है — शरीरधारी मनुष्यों के लिए स्वाभाविक और सुगम है।

यह श्लोक किसी मार्ग को कम नहीं बताता — यह केवल शरीरधारी जीव की स्वाभाविक सीमा की बात करता है।

यह श्लोक 12.2 और 12.3-4 के बाद आता है। कृष्ण ने पहले दोनों मार्गों को मान्यता दी, अब 12.5 में व्यावहारिक बात कही — निर्गुण मार्ग देहधारियों के लिए अधिक कठिन है। यही कारण है कि कृष्ण ने 12.2 में सगुण भक्त को 'युक्ततम' कहा।

परंपरा में इस श्लोक को निर्गुण उपासना की कठिनाई के प्रमाण के रूप में देखा जाता रहा है। इसके बाद 12.6-7 में कृष्ण सगुण भक्त को अपनी ओर से दिया जाने वाला वरदान बताते हैं।

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