यह 12.3 का पूरक श्लोक है। यहाँ कृष्ण उन निर्गुण उपासकों के गुण बताते हैं — वे अपनी सब इन्द्रियों को वश में रखते हैं, हर जगह समान भाव रखते हैं, और सब प्राणियों का भला चाहते हैं। ऐसे साधक भी अंत में कृष्ण को ही पाते हैं।
यह बात ध्यान देने वाली है — 'सर्वभूतहिते रताः' यानी सब प्राणियों के भले में लगे रहना। जैसे एक किसान सिर्फ अपने खेत की नहीं, पूरे गाँव की चिंता करे — वैसे ही यह साधक किसी एक के लिए नहीं, सबके लिए जीता है।