📿 श्लोक संग्रह

सन्नियम्येन्द्रियग्रामम्

गीता 12.4 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 12 — भक्तियोग
सन्नियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः ।
ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः ॥
सन्नियम्य
भली-भाँति वश में करके
इन्द्रियग्रामम्
सभी इन्द्रियों के समूह को
सर्वत्र
सब जगह
समबुद्धयः
समान बुद्धि वाले, एक-सी दृष्टि रखने वाले
ते
वे
प्राप्नुवन्ति
पाते हैं, प्राप्त करते हैं
माम् एव
मुझे ही
सर्वभूतहिते
सब प्राणियों के भले में
रताः
लगे हुए, तत्पर

यह 12.3 का पूरक श्लोक है। यहाँ कृष्ण उन निर्गुण उपासकों के गुण बताते हैं — वे अपनी सब इन्द्रियों को वश में रखते हैं, हर जगह समान भाव रखते हैं, और सब प्राणियों का भला चाहते हैं। ऐसे साधक भी अंत में कृष्ण को ही पाते हैं।

यह बात ध्यान देने वाली है — 'सर्वभूतहिते रताः' यानी सब प्राणियों के भले में लगे रहना। जैसे एक किसान सिर्फ अपने खेत की नहीं, पूरे गाँव की चिंता करे — वैसे ही यह साधक किसी एक के लिए नहीं, सबके लिए जीता है।

यह श्लोक 12.3-4 के जोड़े का दूसरा और अंतिम भाग है। 12.3 में निर्गुण ब्रह्म के स्वरूप का वर्णन था, अब 12.4 में उन उपासकों के लक्षण बताए हैं — इन्द्रिय-संयम, समभाव, और सर्वभूत-हित। यह जोड़ा मिलकर निर्गुण उपासना का पूरा चित्र देता है।

परंपरा में 'सर्वभूतहिते रताः' वाक्यांश को बहुत महत्वपूर्ण माना जाता रहा है। यह निर्गुण उपासक की पहचान है — वह सिर्फ अपनी मुक्ति नहीं चाहता, सबका भला चाहता है।

अध्याय 12 · 4 / 20
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