यह पूरे बारहवें अध्याय का अंतिम और समाहार श्लोक है। कृष्ण कहते हैं — जो इस धर्म-रूपी अमृत को, जैसा मैंने अभी कहा, उसे श्रद्धा के साथ पालते हैं, मुझे ही परम लक्ष्य मानते हैं — वे भक्त मुझे अत्यंत प्रिय हैं।
'धर्म्यामृतम्' — धर्म-रूपी अमृत। यह शब्द बहुत सुंदर है। अमृत पीने से मृत्यु नहीं होती। इस धर्म को जीने से आत्मा का शाश्वत कल्याण होता है। और कृष्ण ने इसे 'मेरी बात' नहीं कही — इसे 'धर्म' कहा। यानी यह कोई एक संप्रदाय का उपदेश नहीं — यह सनातन धर्म का सार है।