📿 श्लोक संग्रह

यस्मान्नोद्विजते लोको

गीता 12.15 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 12 — भक्तियोग
यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः ।
हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः ॥
यस्मात्
जिससे
न उद्विजते
नहीं घबराता, परेशान नहीं होता
लोकः
संसार, लोग
लोकात्
संसार से, लोगों से
न उद्विजते
नहीं घबराता
और
यः
जो
हर्ष
हर्ष, खुशी
अमर्ष
ईर्ष्या, जलन
भय
डर
उद्वेगैः
उद्वेग, बेचैनी से
मुक्तः
मुक्त, स्वतंत्र
यः सः च
वही
मे प्रियः
मुझे प्रिय है

इस श्लोक में दो बातें हैं — एक दिशा से और दूसरी दिशा से। पहली — जिससे संसार नहीं घबराता। यानी यह भक्त किसी के लिए भय का कारण नहीं बनता। दूसरी — जो संसार से नहीं घबराता। यानी दुनिया की उठापटक उसे विचलित नहीं करती।

हर्ष, अमर्ष, भय और उद्वेग — ये चार चीज़ें मन को डाँवाडोल करती हैं। जो इनसे मुक्त है, वह शांत और स्थिर रहता है। जैसे पुरानी बड़ की जड़ें — तूफान में भी नहीं हिलती, पर पक्षियों को छाया और आश्रय देती हैं। ऐसा भक्त कृष्ण को प्रिय है।

यह भक्त-लक्षण श्रृंखला (12.13-19) का तीसरा श्लोक है। 12.13 में द्वेष-रहितता और मैत्री थी, 12.14 में संतोष और दृढ़ता थी, 12.15 में आता है — किसी को भय न देना और स्वयं भी न घबराना। यह सामाजिक शांति का गुण है।

परंपरा में इस श्लोक को 'लोक-संग्रह' की भावना से जोड़कर देखा जाता रहा है — जो भक्त दूसरों में भय नहीं पैदा करता, वह समाज के लिए भी उपयोगी है।

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