📿 श्लोक संग्रह

अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि

गीता 12.10 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 12 — भक्तियोग
अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव ।
मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि ॥
अभ्यासे अपि
अभ्यास में भी
असमर्थः असि
समर्थ नहीं हो
मत्कर्मपरमः
मेरे कार्य को सबसे ऊपर मानने वाला
भव
हो जाओ
मदर्थम्
मेरे लिए
अपि
भी
कर्माणि
कर्म
कुर्वन्
करते हुए
सिद्धिम्
सिद्धि को, सफलता को
अवाप्स्यसि
पाओगे, प्राप्त करोगे

तीसरी सीढ़ी — यदि अभ्यास भी न हो सके, तो मेरे लिए कर्म करो। घर का काम करो — पर मेरे लिए करो। खेत में जाओ — पर मेरे नाम पर जाओ। सेवा करो — पर उसे मेरी सेवा मानकर करो। इस भाव से कर्म करने पर भी सिद्धि मिलती है।

यह बहुत व्यावहारिक उपाय है। जो साधना में नहीं बैठ सकता, जो मन को नहीं रोक सकता — वह भी अपने दैनिक जीवन में ही भक्ति कर सकता है। बस भाव बदलना है — यह काम कृष्ण के लिए है।

यह अभ्यास-योग सोपान की तीसरी सीढ़ी है। 12.8 — मन लगाओ। 12.9 — अभ्यास करो। 12.10 — कर्म मेरे लिए करो। 12.11 में चौथी और अंतिम सीढ़ी आएगी।

परंपरा में इस श्लोक को 'मत्कर्म-परायणता' का सूत्र माना जाता रहा है। यह सामान्य गृहस्थ के लिए सबसे व्यावहारिक मार्ग है — जीवन के हर कर्म को ईश्वर-अर्पण के भाव से करना।

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