कृष्ण अर्जुन की प्रार्थना स्वीकार करते हैं और कहते हैं — हे पार्थ, देखो, मेरे सैकड़ों और हजारों रूप हैं — नाना प्रकार के, दिव्य, अनेक रंगों और आकारों वाले। एक ही परमात्मा में सारी सृष्टि की विविधता समाई हुई है।
जैसे एक ही समुद्र में असंख्य लहरें होती हैं, वैसे ही कृष्ण के एक ही स्वरूप में अनगिनत रूप हैं। यह विश्वरूप दर्शन का निमंत्रण है।