📿 श्लोक संग्रह

न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानैः

गीता 11.48 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 11 — विश्वरूपदर्शनयोग
न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानैर्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः ।
एवंरूपः शक्य अहं नृलोके द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर ॥
वेदयज्ञाध्ययनैः
वेद, यज्ञ और अध्ययन से
क्रियाभिः तपोभिः उग्रैः
कर्मकांड और कठिन तपों से
नृलोके
मनुष्यलोक में
कुरुप्रवीर
हे कुरुवंश के वीर

कृष्ण कहते हैं — हे कुरुप्रवीर, न वेदों से, न यज्ञों से, न अध्ययन से, न दान से, न कर्मकांड से, न कठोर तप से — इस रूप में मनुष्यलोक में तुम्हारे सिवा कोई मुझे नहीं देख सकता।

यह श्लोक बड़ी बात कहता है — बाहरी साधनों से परमात्मा का यह साक्षात् दर्शन नहीं होता। यह केवल कृपा और भक्ति से होता है।

यह अनुष्टुप् छंद का श्लोक है। यह विचार गीता के 11.53 में भी दोहराया जाएगा।

अगले श्लोक (11.49) में कृष्ण अर्जुन को आश्वस्त करेंगे — डरो मत, प्रसन्न मन से मेरा पहले वाला रूप देखो।

अध्याय 11 · 48 / 55
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