अर्जुन कहते हैं — हे अप्रतिम प्रभाव वाले, आप ही इस चराचर जगत के पिता हैं। आप ही सबसे पूजनीय गुरु हैं। तीनों लोकों में आपके समान कोई नहीं — फिर आपसे बढ़कर कैसे कोई होगा?
यहाँ 'गुरुर्गरीयान्' — गुरुओं में श्रेष्ठ — यह बताता है कि समस्त ज्ञान-परंपरा का मूल स्रोत भी वही परमात्मा है।