📿 श्लोक संग्रह

पितासि लोकस्य चराचरस्य

गीता 11.43 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 11 — विश्वरूपदर्शनयोग
पितासि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान् ।
न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो लोकत्रये प्यप्रतिमप्रभाव ॥
चराचरस्य पिता
चर-अचर जगत के पिता
पूज्यः गुरुः गरीयान्
पूजनीय और परम गुरु
न त्वत्समः
आपके समान कोई नहीं
अप्रतिमप्रभाव
हे अतुलनीय प्रभाव वाले

अर्जुन कहते हैं — हे अप्रतिम प्रभाव वाले, आप ही इस चराचर जगत के पिता हैं। आप ही सबसे पूजनीय गुरु हैं। तीनों लोकों में आपके समान कोई नहीं — फिर आपसे बढ़कर कैसे कोई होगा?

यहाँ 'गुरुर्गरीयान्' — गुरुओं में श्रेष्ठ — यह बताता है कि समस्त ज्ञान-परंपरा का मूल स्रोत भी वही परमात्मा है।

यह त्रिष्टुप् छंद का श्लोक है। अर्जुन का विश्वरूप-स्तवन यहाँ अपने चरम पर है।

अगले श्लोक (11.44) में अर्जुन साष्टांग प्रणाम करके विनती करेंगे — जैसे पुत्र, मित्र या प्रियजन क्षमा माँगे।

अध्याय 11 · 43 / 55
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