📿 श्लोक संग्रह

यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसि

गीता 11.42 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 11 — विश्वरूपदर्शनयोग
यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसि विहारशय्यासनभोजनेषु ।
एकोऽथवाप्यच्युत तत्समक्षं तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम् ॥
अवहासार्थम्
हँसी-मजाक में
विहारशय्यासनभोजनेषु
घूमते, सोते, बैठते, खाते समय
एकः अथवा तत्समक्षम्
अकेले या दूसरों के सामने
अप्रमेयम्
हे अप्रमेय (जो मापा न जा सके)

अर्जुन आगे कहते हैं — हे अच्युत, हँसी-मजाक में, घूमते-सोते-बैठते-खाते समय, अकेले में या दूसरों के सामने — जो भी अपमान हुआ हो, हे अप्रमेय, मैं आपसे उसके लिए क्षमा माँगता हूँ।

यह विनम्रता की पराकाष्ठा है। अर्जुन जानते थे कि कृष्ण उनके प्रिय मित्र हैं — पर अब समझ में आया कि वे परमात्मा हैं। यह बोध आते ही वे झुक जाते हैं।

यह त्रिष्टुप् छंद का श्लोक है। 11.41-42 — यह दोनों श्लोक मिलकर भक्ति का एक मार्मिक दृश्य बनाते हैं।

अगले श्लोक (11.43) में अर्जुन कहेंगे — आप चराचर जगत के पिता हैं, पूज्य गुरु हैं, त्रिलोक में आपके समान कोई नहीं।

अध्याय 11 · 42 / 55
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