अर्जुन आगे कहते हैं — हे अच्युत, हँसी-मजाक में, घूमते-सोते-बैठते-खाते समय, अकेले में या दूसरों के सामने — जो भी अपमान हुआ हो, हे अप्रमेय, मैं आपसे उसके लिए क्षमा माँगता हूँ।
यह विनम्रता की पराकाष्ठा है। अर्जुन जानते थे कि कृष्ण उनके प्रिय मित्र हैं — पर अब समझ में आया कि वे परमात्मा हैं। यह बोध आते ही वे झुक जाते हैं।