📿 श्लोक संग्रह

सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तम्

गीता 11.41 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 11 — विश्वरूपदर्शनयोग
सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति ।
अजानता महिमानं तवेदं मया प्रमादात्प्रणयेन वापि ॥
सखा इति मत्वा
मित्र समझकर
प्रसभम्
बेधड़क, जबरदस्ती
अजानता
न जानते हुए
प्रमादात् प्रणयेन
लापरवाही से या प्रेम से

अर्जुन विनम्रता से कहते हैं — हे कृष्ण, हे यादव, हे सखे — यह सब मित्र समझकर, आपकी इस महिमा को न जानते हुए, लापरवाही से या प्रेम से जो कुछ मैंने बेधड़क कह दिया हो — वह सब क्षमा करें।

यह श्लोक (11.41) और अगला (11.42) मिलकर अर्जुन की क्षमा-प्रार्थना हैं। भक्त की यह विनम्रता बहुत स्वाभाविक है — जब परमात्मा की विराटता समझ में आती है, तो पहले की सहजता पर संकोच होता है।

यह त्रिष्टुप् छंद का श्लोक है। 'हे कृष्ण हे यादव हे सखे' — यह पहले की मित्रता के संबोधन हैं जो अब अर्जुन को छोटे लग रहे हैं।

11.42 में अर्जुन विस्तार से बताएंगे — हँसते-खेलते, सोते-बैठते, खाते — जो भी हुआ, क्षमा करें।

अध्याय 11 · 41 / 55
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