📿 श्लोक संग्रह

नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते

गीता 11.40 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 11 — विश्वरूपदर्शनयोग
नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व ।
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः ॥
पुरस्तात् पृष्ठतः
सामने से, पीछे से
सर्वतः एव सर्व
सब ओर से — हे सर्व
अनन्तवीर्यामितविक्रमः
अनंत शक्ति, असीमित पराक्रम वाले
सर्वं समाप्नोषि
सब को व्याप्त किया है

अर्जुन कहते हैं — सामने से नमस्कार, पीछे से नमस्कार, सब ओर से नमस्कार — हे सर्व। आपकी शक्ति अनंत है, पराक्रम असीमित है। आपने सब कुछ व्याप्त किया है — इसलिए आप ही सब कुछ हैं।

यह श्लोक एक दार्शनिक सत्य को सरल शब्दों में कहता है — जो सब में व्याप्त है, वही 'सर्व' — सब — है।

यह त्रिष्टुप् छंद का श्लोक है। 'ततोऽसि सर्वः' — इसलिए आप ही सब हैं — यह उपनिषद् का 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' का प्रतिध्वनि है।

अगले श्लोक (11.41-42) में अर्जुन विनम्रता से क्षमा माँगेंगे — जो भी अनजाने में कहा हो।

अध्याय 11 · 40 / 55
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