अर्जुन कहते हैं — हे विष्णु, आप अपने जलते मुखों से सब लोकों को चारों ओर से चाटते और निगलते हुए समस्त जगत को अपने तेज से भरकर अपनी उग्र किरणों से जला रहे हैं।
यह विश्वरूप के उस पक्ष का वर्णन है जो संहार का है। लेकिन यह संहार क्रोध से नहीं — यह काल का स्वाभाविक धर्म है।