📿 श्लोक संग्रह

यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतङ्गाः

गीता 11.29 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 11 — विश्वरूपदर्शनयोग
यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतङ्गा विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः ।
तथैव नाशाय विशन्ति लोकास्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः ॥
प्रदीप्तम् ज्वलनम्
प्रज्वलित अग्नि
पतङ्गाः
पतंगे (Moths)
नाशाय समृद्धवेगाः
नष्ट होने के लिए तीव्र वेग से
लोकाः
लोग, प्राणी

अर्जुन एक और उपमा देते हैं — जैसे पतंगे जलती अग्नि में नष्ट होने के लिए तेज वेग से प्रवेश करते हैं, वैसे ही ये सब लोग भी नष्ट होने के लिए आपके मुखों में तेज वेग से प्रवेश कर रहे हैं।

पतंगे को पता नहीं होता कि वे मृत्यु की ओर जा रहे हैं। इसी तरह साधारण मनुष्य काल की गति को नहीं जानते।

यह त्रिष्टुप् छंद का श्लोक है। नदी-समुद्र और पतंगे-अग्नि — ये दोनों उपमाएं मिलकर काल की अनिवार्यता को दर्शाती हैं।

अगले श्लोक (11.30) में अर्जुन कहेंगे — आप सब को अपने जलते मुखों से चाट रहे हैं।

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