📿 श्लोक संग्रह

यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाः

गीता 11.28 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 11 — विश्वरूपदर्शनयोग
यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाः समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति ।
तथा तवामी नरलोकवीरा विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति ॥
नदीनाम् अम्बुवेगाः
नदियों के जलप्रवाह
समुद्रम् अभिमुखाः
समुद्र की ओर
नरलोकवीराः
मनुष्यलोक के वीर योद्धा
अभिविज्वलन्ति
प्रज्वलित मुखों में

अर्जुन एक सुंदर उपमा देते हैं — जैसे नदियों के अनेक जलप्रवाह समुद्र की ओर बहते हैं, वैसे ही मनुष्यलोक के ये वीर योद्धा आपके प्रज्वलित मुखों में प्रवेश कर रहे हैं।

यह उपमा बहुत सटीक है। नदी का पानी समुद्र में जाकर खो नहीं जाता — वह समुद्र का हिस्सा बन जाता है। वैसे ही ये प्राणी काल में विलीन होकर परमात्मा का हिस्सा बन जाते हैं।

यह त्रिष्टुप् छंद का श्लोक है। नदी-समुद्र की उपमा भारतीय दर्शन में बहुत पुरानी है। यहाँ अर्जुन उसे स्वतः उपयोग करते हैं।

अगले श्लोक (11.29) में पतंगे-दीपक की उपमा आएगी।

अध्याय 11 · 28 / 55
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