📿 श्लोक संग्रह

वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति

गीता 11.27 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 11 — विश्वरूपदर्शनयोग
वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति दंष्ट्राकरालानि भयानकानि ।
केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु सन्दृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्गैः ॥
त्वरमाणाः विशन्ति
तेजी से प्रवेश करते हैं
दंष्ट्राकरालानि भयानकानि
दाँतों से भयानक
विलग्नाः दशनान्तरेषु
दाँतों के बीच फँसे हुए
चूर्णितैः उत्तमाङ्गैः
चकनाचूर हुए सिरों सहित

अर्जुन देखते हैं — सब योद्धा तेजी से आपके भयानक, दाँतों वाले मुखों में प्रवेश कर रहे हैं। कुछ दाँतों के बीच फँसे हैं और उनके सिर चकनाचूर दिखते हैं। यह दृश्य देखकर अर्जुन की आँखें भर आती हैं।

यह विश्वरूप का सबसे भयावह पल है। लेकिन यह क्रूरता नहीं — यह काल का स्वभाव है। सब कुछ अंततः समाप्त होता है।

यह त्रिष्टुप् छंद का श्लोक है। 11.26-27 में जो वर्णन है वह अर्जुन को यह समझाने के लिए है कि युद्ध का परिणाम पहले से तय है।

अगले श्लोक (11.28) में अर्जुन नदी-समुद्र की उपमा देंगे।

अध्याय 11 · 27 / 55
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