अर्जुन कहते हैं — हे विष्णु, आकाश को छूता, प्रज्वलित, अनेक रंगों वाला, खुले मुख वाला, चमकते विशाल नेत्रों वाला यह रूप देखकर मेरी अंतरात्मा काँप उठती है। न धैर्य पाता हूँ, न शांति।
अर्जुन यहाँ 'विष्णो' संबोधन से कृष्ण को पुकारते हैं — जो सर्वव्यापी हैं। यह उनकी पूर्ण आस्था और साथ ही अत्यंत भय दोनों का मिश्रण है।