अर्जुन करुणा से बोलते हैं — हे देवेश, हे जगन्निवास, आपके भयानक दाँतों वाले मुखों को — जो प्रलय की अग्नि जैसे हैं — देखकर मुझे दिशाएं नहीं सूझतीं। कोई शांति नहीं मिलती। कृपा करें।
यह अर्जुन की पहली प्रत्यक्ष प्रार्थना है जिसमें वे राहत माँग रहे हैं। 'जगन्निवास' — जगत में निवास करने वाले — यह संबोधन उनकी शरण का भाव दिखाता है।