📿 श्लोक संग्रह

द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि

गीता 11.20 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 11 — विश्वरूपदर्शनयोग
द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः ।
दृष्ट्वाद्भुतं रूपमुग्रं तवेदं लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन् ॥
द्यावापृथिव्योः अन्तरम्
स्वर्ग और पृथ्वी के बीच का
व्याप्तम् त्वयैकेन
आप अकेले से व्याप्त
दिशः सर्वाः
सब दिशाएं
लोकत्रयम् प्रव्यथितम्
तीनों लोक काँप रहे हैं

अर्जुन कहते हैं — हे महात्मन, स्वर्ग और पृथ्वी के बीच का यह सारा अंतरिक्ष और सब दिशाएं आप अकेले से भरी हुई हैं। आपका यह अद्भुत और उग्र रूप देखकर तीनों लोक काँप रहे हैं।

यह श्लोक विश्वरूप की व्यापकता और उसके भय-मिश्रित भव्यता दोनों को एक साथ व्यक्त करता है। 'उग्रम्' — उग्र रूप — अर्जुन पहली बार यह शब्द उपयोग करते हैं।

यह त्रिष्टुप् छंद का श्लोक है। 'लोकत्रयम् प्रव्यथितम्' — तीनों लोकों का काँपना — विश्वरूप की विराटता का सबसे सरल वर्णन है।

अगले श्लोक (11.21) में अर्जुन बताएंगे कि सुरगण आपमें प्रवेश कर रहे हैं और महर्षि-सिद्धगण स्तुति कर रहे हैं।

अध्याय 11 · 20 / 55
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