📿 श्लोक संग्रह

अमी हि त्वां सुरसङ्घाः

गीता 11.21 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 11 — विश्वरूपदर्शनयोग
अमी हि त्वां सुरसङ्घाः विशन्ति केचिद्भीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति ।
स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसङ्घाः स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः ॥
सुरसङ्घाः विशन्ति
सुर-समूह प्रवेश करते हैं
भीताः प्राञ्जलयः
भयभीत होकर हाथ जोड़कर
स्वस्ति इति उक्त्वा
'स्वस्ति हो' कहकर
स्तुतिभिः पुष्कलाभिः
भरपूर स्तुतियों से

अर्जुन देखते हैं — सुर-समूह आपमें प्रवेश कर रहे हैं। कुछ भयभीत होकर हाथ जोड़कर आपकी स्तुति कर रहे हैं। महर्षि और सिद्धगण 'स्वस्ति हो' कहकर भरपूर स्तुतियों से आपको प्रणाम कर रहे हैं।

यह दृश्य बताता है कि विश्वरूप के सामने देवता भी विनम्र हो जाते हैं। 'स्वस्ति' — मंगल हो — यह आर्यों की परंपरागत अभिवादन की शुभकामना है।

यह त्रिष्टुप् छंद का श्लोक है। सुर, महर्षि और सिद्ध — तीनों ही श्रेणियाँ विश्वरूप के सामने नत हैं।

अगले श्लोक (11.22) में अर्जुन विभिन्न देव-वर्गों की पूरी सूची देंगे जो इस रूप को देखकर विस्मित हैं।

अध्याय 11 · 21 / 55
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