अर्जुन देखते हैं — सुर-समूह आपमें प्रवेश कर रहे हैं। कुछ भयभीत होकर हाथ जोड़कर आपकी स्तुति कर रहे हैं। महर्षि और सिद्धगण 'स्वस्ति हो' कहकर भरपूर स्तुतियों से आपको प्रणाम कर रहे हैं।
यह दृश्य बताता है कि विश्वरूप के सामने देवता भी विनम्र हो जाते हैं। 'स्वस्ति' — मंगल हो — यह आर्यों की परंपरागत अभिवादन की शुभकामना है।