📿 श्लोक संग्रह

त्वमक्षरं परमं वेदितव्यम्

गीता 11.18 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 11 — विश्वरूपदर्शनयोग
त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ।
त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे ॥
त्वम् अक्षरं परमम्
आप ही परम अविनाशी हैं
विश्वस्य परं निधानम्
जगत का सर्वोच्च आधार
शाश्वतधर्मगोप्ता
सनातन धर्म के रक्षक
सनातनः पुरुषः
शाश्वत पुरुष

अर्जुन कहते हैं — आप ही परम अविनाशी हैं, जानने योग्य हैं। आप ही इस जगत का परम आधार हैं। आप सनातन धर्म के रक्षक हैं — मेरी समझ में आप ही शाश्वत पुरुष हैं।

यह श्लोक अर्जुन के स्तवन का एक उच्च बिंदु है। 'मतो मे' — मेरी समझ में — यह विनम्रता है। अर्जुन दावा नहीं करते, अनुभव बताते हैं।

यह त्रिष्टुप् छंद का श्लोक है। अर्जुन यहाँ कृष्ण को अक्षर, सनातन, धर्मगोप्ता और पुरुष — चार नामों से संबोधित करते हैं।

अगले श्लोक (11.19) में अर्जुन आगे कहेंगे — अनादि, अनंत बल, अनगिनत भुजाओं वाले, सूर्य-चंद्र आँखों वाले।

अध्याय 11 · 18 / 55
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