📿 श्लोक संग्रह

अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रम्

गीता 11.16 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 11 — विश्वरूपदर्शनयोग
अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम् ।
नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप ॥
अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रम्
अनेक भुजा-पेट-मुख-नेत्र वाला
सर्वतः अनन्तरूपम्
सब ओर से अनंत रूप वाला
विश्वेश्वर
हे विश्वेश्वर
नान्तं न मध्यम् न आदिम्
न अंत, न मध्य, न आदि

अर्जुन कहते हैं — हे विश्वेश्वर, हे विश्वरूप, मैं आपको सब ओर से देख रहा हूँ — अनेक भुजाओं, पेटों, मुखों और नेत्रों वाला अनंत रूप। न आपका आदि दिखता है, न मध्य, न अंत। जैसे आकाश का ओर-छोर नहीं होता।

यह अनुभव बताता है कि परमात्मा की कोई सीमा नहीं — वे अनंत हैं। अर्जुन उस अनंतता के सामने विस्मित खड़े हैं।

यह त्रिष्टुप् छंद का श्लोक है। अर्जुन यहाँ पहली बार 'विश्वरूप' शब्द बोलते हैं।

उपनिषदों में भी कहा गया है — अनंत ब्रह्म का आदि-मध्य-अंत नहीं होता। अर्जुन यहाँ उसी सत्य को साक्षात् देख रहे हैं।

अध्याय 11 · 16 / 55
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