अर्जुन कहते हैं — हे विश्वेश्वर, हे विश्वरूप, मैं आपको सब ओर से देख रहा हूँ — अनेक भुजाओं, पेटों, मुखों और नेत्रों वाला अनंत रूप। न आपका आदि दिखता है, न मध्य, न अंत। जैसे आकाश का ओर-छोर नहीं होता।
यह अनुभव बताता है कि परमात्मा की कोई सीमा नहीं — वे अनंत हैं। अर्जुन उस अनंतता के सामने विस्मित खड़े हैं।