📿 श्लोक संग्रह

ततः स विस्मयाविष्टो

गीता 11.14 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 11 — विश्वरूपदर्शनयोग
ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनञ्जयः ।
प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत ॥
विस्मयाविष्टः
विस्मय से भरे हुए
हृष्टरोमा
रोमांचित — रोम खड़े हो गए
प्रणम्य शिरसा
सिर झुकाकर प्रणाम करके
कृताञ्जलिः
हाथ जोड़कर

तब धनंजय अर्जुन विस्मय से भर गए। उनके शरीर के रोम खड़े हो गए। उन्होंने सिर झुकाकर उस देव को प्रणाम किया और हाथ जोड़कर बोलने लगे। यह भक्त का स्वाभाविक भाव है — विराट दर्शन के सामने शब्द रुक जाते हैं, बस नमन रह जाता है।

रोमांच — रोम खड़े होना — भक्ति का एक शारीरिक लक्षण है। गीता में यह भाव यहाँ प्रकट होता है।

यह संजय का वर्णन है। अब से अर्जुन का विश्वरूप-स्तवन (गीता 11.15–31) शुरू होगा।

अर्जुन अगले श्लोक में जो देखते हैं उसका वर्णन करेंगे — ब्रह्मा, ऋषि, देवसर्प सब उस विराट रूप में।

अध्याय 11 · 14 / 55
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