तब धनंजय अर्जुन विस्मय से भर गए। उनके शरीर के रोम खड़े हो गए। उन्होंने सिर झुकाकर उस देव को प्रणाम किया और हाथ जोड़कर बोलने लगे। यह भक्त का स्वाभाविक भाव है — विराट दर्शन के सामने शब्द रुक जाते हैं, बस नमन रह जाता है।
रोमांच — रोम खड़े होना — भक्ति का एक शारीरिक लक्षण है। गीता में यह भाव यहाँ प्रकट होता है।