तब अर्जुन ने देवों के देव के उस एक शरीर में — अनेक प्रकार से विभाजित — सारे जगत को एक स्थान पर देखा। जैसे एक दर्पण में पूरा कमरा दिखता है, वैसे ही उस एक विराट रूप में सारी सृष्टि दिखती थी।
यह 'प्रविभक्तमनेकधा' — अनेक प्रकार से विभाजित — बताता है कि विविधता बाहर से है। भीतर से सब एक ही है।