📿 श्लोक संग्रह

दिवि सूर्यसहस्रस्य

गीता 11.12 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 11 — विश्वरूपदर्शनयोग
दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता ।
यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः ॥
दिवि
आकाश में
सूर्यसहस्रस्य
हजार सूर्यों का
युगपत् उत्थिता
एक साथ उदित
महात्मनः भासः
उस महात्मा का प्रकाश

संजय एक असाधारण उपमा देते हैं — यदि आकाश में एक साथ हजार सूर्य उदय हो जाएं, तो उनकी सम्मिलित रोशनी उस महात्मा के तेज के समान हो सकती है। जैसे एक दीपक की रोशनी का हम अनुमान लगा सकते हैं — पर असंख्य दीपकों की रोशनी की कल्पना भी कठिन होती है।

यह उपमा बताती है कि विश्वरूप का प्रकाश मानव कल्पना से परे है। संजय शब्दों की सीमा स्वीकार करते हुए भी यह प्रयास करते हैं।

यह गीता का सबसे प्रसिद्ध उपमा-श्लोक है। यह पंक्ति 'दिवि सूर्यसहस्रस्य...' विश्वरूप दर्शन का सार है।

अगले श्लोक (11.13) में अर्जुन इस विराट रूप में सारे लोकों को एक स्थान पर देखेंगे।

अध्याय 11 · 12 / 55
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