📿 श्लोक संग्रह

तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नम्

गीता 11.13 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 11 — विश्वरूपदर्शनयोग
तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा ।
अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा ॥
तत्र एकस्थम्
वहाँ एक में स्थित
प्रविभक्तम् अनेकधा
अनेक प्रकार से विभाजित
देवदेवस्य शरीरे
देवों के देव के शरीर में
पाण्डवः
पांडुपुत्र अर्जुन

तब अर्जुन ने देवों के देव के उस एक शरीर में — अनेक प्रकार से विभाजित — सारे जगत को एक स्थान पर देखा। जैसे एक दर्पण में पूरा कमरा दिखता है, वैसे ही उस एक विराट रूप में सारी सृष्टि दिखती थी।

यह 'प्रविभक्तमनेकधा' — अनेक प्रकार से विभाजित — बताता है कि विविधता बाहर से है। भीतर से सब एक ही है।

यह संजय का वर्णन है, जो अर्जुन के अनुभव को हमें बता रहे हैं। यह गीता के सबसे रहस्यमय और भव्य क्षणों में एक है।

अगले श्लोक (11.14) में अर्जुन की प्रतिक्रिया दिखेगी — वे आश्चर्य से रोमांचित होकर हाथ जोड़ लेंगे।

अध्याय 11 · 13 / 55
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