📿 श्लोक संग्रह

एतां विभूतिं योगं च

गीता 10.7 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 10 — विभूतियोग
एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः ।
सोऽविकम्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः ॥
एताम्
इस
विभूतिम्
विभूति — ऐश्वर्य को
योगम् च
और योग को
मम
मेरी
यः वेत्ति
जो जानता है
तत्त्वतः
सच में — यथार्थ रूप से
सः
वह
अविकम्पेन
अटल — बिना डगमगाए
योगेन युज्यते
योग से जुड़ता है
न अत्र संशयः
इसमें संशय नहीं

यह श्लोक एक आश्वासन है। कृष्ण कहते हैं — जो मेरी विभूति और योग को सच में जान लेता है, वह 'अविकम्पेन योगेन' जुड़ता है — बिना डगमगाए, स्थिर योग से। यानी ज्ञान ही योग का आधार है। जहाँ सच्चा ज्ञान है, वहाँ योग स्वाभाविक रूप से आता है।

'तत्त्वतः' — इस एक शब्द में बहुत कुछ है। सतह पर जानना नहीं, भीतर से जानना। जैसे कोई कहे 'मैं जानता हूँ पानी ठंडा होता है' — और कोई कहे 'मैंने जाड़े की रात में नदी में नहाकर जाना है'। दूसरा 'तत्त्वतः' जानना है।

यह श्लोक विभूतियोग के पहले खंड (10.1-7) का समापन है। 10.1 में शुरुआत हुई, 10.7 में फल बताया गया। अब 10.8 से नया खंड शुरू होगा — जहाँ कृष्ण विशिष्ट विभूतियाँ गिनाएंगे।

भगवद्गीता में 'नात्र संशयः' वाक्यांश कई बार आता है — जब कृष्ण किसी बात की निश्चितता पर जोर देना चाहते हैं। यहाँ यह वाक्यांश योग की प्राप्ति की निश्चितता पर है।

अध्याय 10 · 7 / 42
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