📿 श्लोक संग्रह

यच्चापि सर्वभूतानाम्

गीता 10.39 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 10 — विभूतियोग
यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन ।
न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम् ॥
यत् च अपि
और जो भी
सर्वभूतानाम्
सब प्राणियों का
बीजम्
बीज
तत् अहम् अर्जुन
वह मैं हूँ, अर्जुन
न तत् अस्ति
वह नहीं है
विना
बिना
यत् स्यात्
जो हो सके
मया
मेरे
भूतम् चराचरम्
चर और अचर प्राणी

यह श्लोक विभूति-सूची का सार है। कृष्ण ने इतने सारे उदाहरण दिए — और अब कहते हैं — जो भी सब प्राणियों का बीज है, वह मैं हूँ। बीज में पूरा वृक्ष छुपा होता है। इसी तरह परमात्मा में पूरी सृष्टि छुपी है।

'न तदस्ति विना यत्स्यान्मया' — ऐसा कुछ भी नहीं है जो मेरे बिना हो सके। यह सबसे व्यापक वाक्य है। चर — जो चलता है। अचर — जो स्थिर है। दोनों में, सब में — परमात्मा हैं। यह कहकर कृष्ण विभूति-सूची का समापन करते हैं।

यह श्लोक 10.8 के 'अहं सर्वस्य प्रभवः' का विस्तार है। वहाँ कृष्ण ने कहा — मैं सबका उद्गम हूँ। यहाँ कहते हैं — मेरे बिना कुछ हो नहीं सकता। दोनों मिलकर परमात्मा की सर्वव्यापकता का पूरा चित्र बनाते हैं।

भगवद्गीता के 9.4-5 में भी यही भाव है — 'मया ततमिदं सर्वम्' — मुझसे यह सब व्याप्त है। 10.39 उसी भाव की पुनरावृत्ति है — विभूति-सूची के अंत में।

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