📿 श्लोक संग्रह

वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि

गीता 10.37 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 10 — विभूतियोग
वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनञ्जयः ।
मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः ॥
वृष्णीनाम्
वृष्णि वंश में
वासुदेवः अस्मि
वासुदेव हूँ
पाण्डवानाम्
पांडवों में
धनञ्जयः
धनंजय — अर्जुन
मुनीनाम् अपि अहम्
मुनियों में भी मैं
व्यासः
व्यास
कवीनाम्
कवियों में
उशना कविः
उशना — शुक्राचार्य कवि

यह श्लोक बहुत अनूठा है। कृष्ण कह रहे हैं — वृष्णियों में मैं वासुदेव हूँ। यानी कृष्ण स्वयं को अपनी विभूति बता रहे हैं! और पांडवों में धनंजय — यानी अर्जुन को भी अपनी विभूति कह रहे हैं। जिससे बात हो रही है, उसे भी परमात्मा का रूप बता रहे हैं — यह गीता का परम क्षण है।

व्यास — जिन्होंने महाभारत लिखा। उशना — शुक्राचार्य, जो असुरों के गुरु और एक महान कवि थे। दोनों को विभूति बताकर गीता कहती है — ज्ञान और काव्य-शक्ति कहीं से भी आए, वह परमात्मा की शक्ति है।

कृष्ण का स्वयं को वासुदेव कहना गीता में आत्म-साक्षात्कार का एक विशेष क्षण है। यह 'अहं ब्रह्मास्मि' उपनिषद-वाक्य की गीता में प्रतिध्वनि है — केवल कृष्ण के संदर्भ में।

अर्जुन को धनंजय — धन जीतने वाला — कहना यहाँ प्रेम का संकेत है। जो सामने बैठा है, जो शिष्य है, वह भी परमात्मा की विभूति है। यह दृष्टि ही गुरु-शिष्य संबंध को पवित्र बनाती है।

अध्याय 10 · 37 / 42
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