📿 श्लोक संग्रह

यो मामजमनादिं च

गीता 10.3 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 10 — विभूतियोग
यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम् ।
असम्मूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥
यः
जो
माम्
मुझे
अजम्
अजन्मा
अनादिम्
अनादि — जिसका कोई आदि नहीं
और
वेत्ति
जानता है
लोकमहेश्वरम्
लोकों का महान ईश्वर
असम्मूढः
निर्मोही — भ्रमरहित
सः
वह
मर्त्येषु
मनुष्यों में
सर्वपापैः
सब पापों से
प्रमुच्यते
मुक्त हो जाता है

इस श्लोक में ज्ञान का फल बताया गया है। जो मनुष्य यह जान लेता है कि कृष्ण अजन्मा हैं, अनादि हैं, और सब लोकों के महान ईश्वर हैं — वह 'असम्मूढ़' हो जाता है। असम्मूढ़ का अर्थ है — जिसका मोह टूट गया, जो भ्रमित नहीं रहा। यही ज्ञान की असली पहचान है।

गीता में पाप का अर्थ केवल बुरे कर्म नहीं है — अज्ञान और मोह भी पाप के मूल हैं। जब ज्ञान आता है, तो मोह टूटता है, और उसी के साथ कर्मों का बंधन भी ढीला पड़ता है। इसीलिए यह श्लोक कहता है — सब पापों से मुक्ति हो जाती है।

यह श्लोक 10.2 का विस्तार है। पहले बताया — कोई मेरा मूल नहीं जानता। अब बताया — जो जानता है, उसे क्या मिलता है। ज्ञान और मुक्ति का सीधा संबंध गीता की केंद्रीय शिक्षा है।

भगवद्गीता के तीसरे और सातवें अध्याय में भी ज्ञान से मोक्ष की बात आती है। दसवें अध्याय में इसे विभूतियों के संदर्भ में देखा गया है।

अध्याय 10 · 3 / 42
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