इस श्लोक में ज्ञान का फल बताया गया है। जो मनुष्य यह जान लेता है कि कृष्ण अजन्मा हैं, अनादि हैं, और सब लोकों के महान ईश्वर हैं — वह 'असम्मूढ़' हो जाता है। असम्मूढ़ का अर्थ है — जिसका मोह टूट गया, जो भ्रमित नहीं रहा। यही ज्ञान की असली पहचान है।
गीता में पाप का अर्थ केवल बुरे कर्म नहीं है — अज्ञान और मोह भी पाप के मूल हैं। जब ज्ञान आता है, तो मोह टूटता है, और उसी के साथ कर्मों का बंधन भी ढीला पड़ता है। इसीलिए यह श्लोक कहता है — सब पापों से मुक्ति हो जाती है।