📿 श्लोक संग्रह

अश्वत्थः सर्ववृक्षाणाम्

गीता 10.26 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 10 — विभूतियोग
अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः ।
गन्धर्वाणां चित्ररथः सिद्धानां कपिलो मुनिः ॥
अश्वत्थः
पीपल का वृक्ष
सर्ववृक्षाणाम्
सब वृक्षों में
देवर्षीणाम् च
और देवर्षियों में
नारदः
नारद
गन्धर्वाणाम्
गंधर्वों में
चित्ररथः
चित्ररथ
सिद्धानाम्
सिद्धों में
कपिलः मुनिः
कपिल मुनि

अश्वत्थ — पीपल का वृक्ष — परंपरा में बहुत पवित्र माना जाता है। कृष्ण ने पंद्रहवें अध्याय में भी अश्वत्थ वृक्ष की उपमा दी है — संसार को उलटे पीपल के रूप में। यहाँ उसे सब वृक्षों में श्रेष्ठ कहा गया है।

नारद — देवर्षि नारद जो हमेशा 'नारायण-नारायण' जपते हुए तीनों लोकों में घूमते हैं — वे भक्ति के सबसे प्रमुख प्रतीक हैं। कपिल मुनि — सांख्य दर्शन के प्रणेता। ज्ञान और भक्ति दोनों परमात्मा की विभूतियाँ हैं।

अश्वत्थ का उल्लेख गीता के 15.1 में भी है — वहाँ इसे संसार का प्रतीक बताया गया है। यहाँ 10.26 में इसे विभूति बताया गया है। दोनों संदर्भ मिलाकर पढ़ने पर अश्वत्थ का महत्व स्पष्ट होता है।

नारद का उल्लेख अर्जुन ने 10.13 में भी किया था — वहाँ प्रमाण के रूप में। यहाँ 10.26 में वे स्वयं कृष्ण की विभूति बने। यह गीता की आंतरिक संगति का एक सुंदर उदाहरण है।

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