📿 श्लोक संग्रह

वेदानां सामवेदोऽस्मि

गीता 10.22 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 10 — विभूतियोग
वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः ।
इन्द्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना ॥
वेदानाम्
वेदों में
सामवेदः अस्मि
सामवेद हूँ
देवानाम् अस्मि
देवों में हूँ
वासवः
वासव — इंद्र
इन्द्रियाणाम्
इंद्रियों में
मनः च अस्मि
मन हूँ
भूतानाम् अस्मि
प्राणियों में हूँ
चेतना
चेतना — चेत — जागरूकता

चार वेदों में सामवेद संगीत का वेद है — उसमें मंत्र गाए जाते हैं, केवल पढ़े नहीं जाते। कृष्ण कहते हैं मैं सामवेद हूँ — शायद इसलिए कि संगीत में भाव सबसे सीधे हृदय तक पहुँचता है। देवों में इंद्र — जो सबका राजा है।

सबसे महत्वपूर्ण बात इस श्लोक में है — 'भूतानामस्मि चेतना।' प्राणियों में मैं चेतना हूँ। चेतना वह है जो जागती है, जो देखती है, जो जानती है। हर प्राणी की यह जानने की शक्ति — वही परमात्मा है।

यह श्लोक भीतरी और बाहरी दोनों विभूतियों को एक साथ बताता है। वेद, देव — ये बाहरी हैं। मन और चेतना — ये भीतरी हैं। कृष्ण दोनों में हैं।

भगवद्गीता के छठे अध्याय में मन को ही योग का साधन और बाधा दोनों बताया गया है। 10.22 में मन को कृष्ण की विभूति कहना उसे एक नई गरिमा देता है।

अध्याय 10 · 22 / 42
अध्याय 10 · 22 / 42 अगला →