📿 श्लोक संग्रह

विस्तरेणात्मनो योगम्

गीता 10.18 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 10 — विभूतियोग
विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन ।
भूयः कथय तृप्तिर्हि श्रृण्वतो नास्ति मेऽमृतम् ॥
विस्तरेण
विस्तार से
आत्मनः योगम्
अपना योग
विभूतिम् च
और विभूति
जनार्दन
हे जनार्दन (कृष्ण)
भूयः
फिर से
कथय
बताइए
तृप्तिः हि
क्योंकि तृप्ति
श्रृण्वतः
सुनते हुए को
न अस्ति
नहीं है
मे अमृतम्
आपके अमृत-वचन से

यह श्लोक सुनने वाले का सबसे सुंदर प्रशंसापत्र है। अर्जुन कह रहा है — आपके वचन अमृत की तरह हैं, सुनते-सुनते तृप्ति नहीं होती। इससे बड़ी प्रशंसा किसी वक्ता के लिए क्या हो सकती है? जब श्रोता और बोलने वाले के बीच यह संबंध बनता है, तभी ज्ञान उतरता है।

'अमृतम्' — अमृत। गीता में ज्ञान को बार-बार अमृत कहा गया है। जैसे अमृत पीने से प्यास नहीं बुझती लेकिन मृत्यु-भय जाता है — ऐसे ही गीता के वचन बार-बार सुनने पर ताजे लगते हैं और संसार का भय कम होता है।

यह अर्जुन के तीन श्लोकों (10.16-18) का अंतिम है। 10.16 में माँग की, 10.17 में पूछा, 10.18 में प्रेम व्यक्त किया। अब 10.19 से कृष्ण उत्तर देंगे।

भगवद्गीता में 'अमृत' शब्द कई बार आता है। 9.20 में भी और 18.37 में भी। 10.18 में अर्जुन स्वयं इस शब्द का प्रयोग करता है — यह उसकी साधना की गहराई दिखाता है।

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