📿 श्लोक संग्रह

कथं विद्यामहं योगिन्

गीता 10.17 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 10 — विभूतियोग
कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन् ।
केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया ॥
कथम्
कैसे
विद्याम् अहम्
मैं जान सकूँ
योगिन्
हे योगिन्
त्वाम्
आपको
सदा
हमेशा
परिचिन्तयन्
ध्यान करते हुए
केषु केषु
किन-किन में
च भावेषु
और भावों में
चिन्त्यः असि
ध्याने जाने योग्य हैं
भगवन् मया
हे भगवान, मेरे द्वारा

अर्जुन का यह प्रश्न बहुत व्यावहारिक है। वह कह रहा है — ठीक है, मैं ध्यान करूँगा, लेकिन किस रूप में? किन-किन चीजों में आपको देखूँ? यह प्रश्न उन सबका है जो परमात्मा को पूजना चाहते हैं लेकिन अमूर्त से उन्हें पकड़ना मुश्किल लगता है।

यहाँ 'केषु केषु' दोहराया गया है — किन-किन में। यह जिज्ञासा की गहराई दिखाता है। अर्जुन एक-दो उदाहरण नहीं चाहता — वह समग्र समझना चाहता है। इसीलिए कृष्ण आगे विस्तृत सूची देंगे।

यह श्लोक 10.16-18 के जोड़े का दूसरा है। 10.16 में 'बताइए' कहा; 10.17 में 'कैसे जानूँ' पूछा; 10.18 में 'और सुनाइए' कहेगा। तीनों मिलकर अर्जुन की तीव्र जिज्ञासा दर्शाते हैं।

भगवद्गीता में यह प्रश्न साधना के एक महत्वपूर्ण पहलू को छूता है — ध्यान में क्या सोचें। 10.20 से 10.42 तक कृष्ण इसी का उत्तर देंगे।

अध्याय 10 · 17 / 42
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