📿 श्लोक संग्रह

आहुस्त्वामृषयः सर्वे

गीता 10.13 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 10 — विभूतियोग
आहुस्त्वामृषयः सर्वे देवर्षिर्नारदस्तथा ।
असितो देवलो व्यासः स्वयं चैव ब्रवीषि मे ॥
आहुः
कहते हैं
त्वाम्
आपको
ऋषयः सर्वे
सब ऋषि
देवर्षिः नारदः
देवर्षि नारद
तथा
वैसे ही
असितः देवलः
असित और देवल
व्यासः
व्यास
स्वयम् च एव
और आप स्वयं भी
ब्रवीषि
कह रहे हैं
मे
मुझे

अर्जुन यहाँ अपनी स्तुति को दृढ़ करता है। वह कहता है — यह मैंने नहीं सोचा, बड़े-बड़े ऋषियों ने यही कहा है — नारद, असित, देवल और स्वयं वेद व्यास। और अब आप स्वयं भी यही बता रहे हैं। यानी अर्जुन की बात में तीन प्रमाण हैं — परंपरा, ऋषि-वचन, और गुरु का स्वयं कहना।

यहाँ व्यास का उल्लेख महत्वपूर्ण है। व्यास वही हैं जिन्होंने महाभारत लिखा, जिसमें गीता है। अर्जुन व्यास को प्रमाण मान रहा है — और यह व्यास की ही रचना में लिखा है। यह एक गहरी काव्यात्मक संरचना है।

यह 10.12-13 के जोड़े का दूसरा भाग है। अर्जुन ने 10.12 में कृष्ण के गुण गिनाए, अब 10.13 में प्रमाण दिए। यह गीता में श्रद्धा और तर्क दोनों का सुंदर समन्वय है।

वेद व्यास को भगवद्गीता में विभूतियोग (10.37) में भी कृष्ण की विभूति के रूप में गिना गया है। इस तरह 10.13 और 10.37 का सूत्र मिलता है।

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