📿 श्लोक संग्रह

तेषां सततयुक्तानाम्

गीता 10.10 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 10 — विभूतियोग
तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् ।
ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते ॥
तेषाम्
उन्हें
सततयुक्तानाम्
सदा लगे रहने वालों को
भजताम्
भजने वालों को
प्रीतिपूर्वकम्
प्रेम सहित
ददामि
देता हूँ
बुद्धियोगम्
बुद्धियोग — समझ का योग
तम्
वह (जो)
येन
जिससे
माम् उपयान्ति
मुझे प्राप्त होते हैं
ते
वे

यह श्लोक गीता के सबसे मीठे वचनों में से एक है। कृष्ण कहते हैं — जो लोग प्रेम से, निरंतर मेरी भक्ति में लगे हैं, उन्हें मैं स्वयं वह बुद्धि देता हूँ जिससे वे मुझे पा सकें। यानी साधक को केवल लगे रहना है — बाकी काम भगवान करते हैं। यह गीता का अनुग्रह का सिद्धांत है।

'प्रीतिपूर्वकम्' — प्रेम के साथ। यह एक शर्त नहीं, एक गुण है। जब भक्ति में प्रेम होता है, तो वह सच्ची होती है। ऐसे भक्त को कृष्ण बुद्धि देते हैं — यह बुद्धि किताबी नहीं है, भीतर से जागने वाली समझ है।

यह श्लोक 10.9 का परिणाम है। जो लोग सत्संग में लगे थे, उनके लिए कृष्ण का आश्वासन आता है — मैं उन्हें बुद्धियोग दूँगा। यह ईश्वर की करुणा का वर्णन है।

भगवद्गीता के 18.66 में भी कृष्ण ने कहा — 'मैं तुम्हें सब पापों से मुक्त करूँगा।' 10.10 और 18.66 दोनों में एक ही भाव है — भक्त को केवल समर्पण करना है।

अध्याय 10 · 10 / 42
अध्याय 10 · 10 / 42 अगला →