📿 श्लोक संग्रह

उत्सन्नकुलधर्माणाम्

गीता 1.44 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 1 — अर्जुनविषादयोग
उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन ।
नरकेऽनियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम ॥
उत्सन्नकुलधर्माणाम्
जिनका कुलधर्म नष्ट हो गया
मनुष्याणाम्
मनुष्यों का
जनार्दन
हे कृष्ण
नरके
नरक में
अनियतम्
अनिश्चित काल तक
वासः
निवास
भवति
होता है
इति
ऐसा
अनुशुश्रुम
हमने सुना है

अर्जुन कहते हैं — हे जनार्दन, हमने सुना है कि जिन मनुष्यों के कुल-धर्म नष्ट हो जाते हैं, उन्हें अनिश्चित काल तक नरक में रहना पड़ता है।

यहाँ अर्जुन अपने गुरुओं और बड़ों से सुनी बातों का सहारा ले रहे हैं। जैसे बच्चों को दादा-दादी बताते हैं कि अच्छा करो तो अच्छा फल मिलता है — वैसे ही अर्जुन को बताया गया था कि कुल-धर्म का नाश करने वालों को बहुत बुरा फल भोगना पड़ता है।

'अनुशुश्रुम' — हमने सुना है — यह शब्द दर्शाता है कि अर्जुन गुरु-परम्परा का सम्मान करते हैं और जो सुना है उस पर विश्वास करते हैं।

यह श्लोक अर्जुन के तर्कों का चरम बिन्दु है — उन्होंने कुल-नाश से नरक-वास तक की पूरी शृंखला बता दी। अब आगे वे अपने दुख को और गहराई से व्यक्त करेंगे।

श्रुति-परम्परा — अर्थात गुरु-शिष्य परम्परा में सुनकर सीखना — भारतीय संस्कृति की नींव है। अर्जुन यहाँ उसी परम्परा का उल्लेख करते हैं।

अध्याय 1 · 44 / 47
← पिछला अध्याय 1 · 44 / 47 अगला →