📿 श्लोक संग्रह

सङ्करो नरकायैव

गीता 1.42 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 1 — अर्जुनविषादयोग
सङ्करो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च ।
पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः ॥
सङ्करः
वर्णसंकर
नरकाय
नरक के लिए
एव
ही
कुलघ्नानाम्
कुल का नाश करने वालों के
कुलस्य
कुल के
पतन्ति
गिर जाते हैं
पितरः
पूर्वज / पितर
एषाम्
इनके
लुप्तपिण्डोदकक्रियाः
जिनका पिण्डदान और तर्पण बंद हो गया

अर्जुन कहते हैं कि वर्णसंकर होने से कुल को नष्ट करने वालों और उनके कुल दोनों को नरक की प्राप्ति होती है। इनके पूर्वज भी गिर जाते हैं क्योंकि उनका पिण्डदान और जल-तर्पण बंद हो जाता है।

भारतीय परम्परा में पितरों को पिण्डदान और तर्पण देना बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। यह वैसे ही है जैसे आज भी हम अपने बड़ों की याद में श्रद्धांजलि देते हैं और उनकी स्मृति को जीवित रखते हैं। अर्जुन की चिन्ता है कि यदि कुल ही नष्ट हो जाएगा, तो पितरों की सेवा कौन करेगा?

यह एक बहुत व्यावहारिक चिन्ता है — जब परिवार टूटता है, तो पुरानी पीढ़ियों की यादें और परम्पराएँ भी खो जाती हैं।

अर्जुन की शृंखला यहाँ एक और कड़ी जोड़ती है — वर्णसंकर → पितरों का पतन। 'लुप्तपिण्डोदकक्रियाः' एक लम्बा समास है जिसका अर्थ है — जिनका पिण्ड और जल देने की क्रिया बंद हो गई। यह दर्शाता है कि अर्जुन को केवल जीवित लोगों की ही नहीं, पूर्वजों की भी चिन्ता है।

अध्याय 1 · 42 / 47
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