📿 श्लोक संग्रह

निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः

गीता 1.36 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 1 — अर्जुनविषादयोग
निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन ।
पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिनः ॥
निहत्य
मारकर
धार्तराष्ट्रान्
धृतराष्ट्र के पुत्रों को
नः
हमें
का
क्या
प्रीतिः
प्रसन्नता
स्यात्
होगी
जनार्दन
हे कृष्ण
पापम्
पाप
एव
ही
आश्रयेत्
लगेगा
आततायिनः
आक्रमणकारियों को

अर्जुन कहते हैं — हे जनार्दन, धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारकर हमें क्या खुशी मिलेगी? इन आततायियों — यानी आक्रमणकारियों — को मारने से तो हमें पाप ही लगेगा।

यहाँ अर्जुन एक बहुत गहरा प्रश्न उठा रहे हैं। शास्त्र कहते हैं कि आततायी को दंड देना उचित है, लेकिन अर्जुन का हृदय कहता है कि ये आततायी भी तो अपने ही कुल के हैं। जैसे घर का कोई सदस्य गलत राह पर चल पड़े, तो उसे दंड देना कितना कठिन होता है!

अर्जुन की इस उलझन में धर्म और प्रेम का संघर्ष दिखता है — क्या सही है और क्या करना चाहिए, यह स्पष्ट नहीं रहा।

यह श्लोक विशेष है क्योंकि इसमें दो भाग हैं — पहले अर्जुन प्रश्न करते हैं (हमें क्या प्रसन्नता होगी?), फिर स्वयं उत्तर देते हैं (पाप ही लगेगा)। यह दिखाता है कि अर्जुन का मन पहले ही निर्णय कर चुका है कि युद्ध गलत है।

परम्परा में 'आततायी' शब्द पर विशेष चर्चा होती है — शास्त्रों के अनुसार आततायी को मारने में पाप नहीं लगता, लेकिन अर्जुन इस नियम को भी अपनी स्थिति में लागू नहीं मानते।

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