अर्जुन कहते हैं — "हे कृष्ण! मुझे न विजय चाहिए, न राज्य चाहिए, न सुख चाहिए। हे गोविन्द! हमें राज्य से क्या करना, भोगों से क्या करना, या फिर जीवन से ही क्या करना?" यह अर्जुन के विषाद की चरम अभिव्यक्ति है।
सोचिए — जिस राज्य के लिए पांडवों ने तेरह वर्ष वनवास काटा, जिस न्याय के लिए कृष्ण ने स्वयं दूत बनकर संधि का प्रस्ताव रखा — उसी राज्य को अर्जुन अब ठुकरा रहे हैं। क्यों? क्योंकि उस राज्य की क़ीमत अपनों का रक्त है।
'गोविन्द' नाम से अर्जुन कृष्ण को पुकारते हैं — गोविन्द अर्थात गायों और इन्द्रियों के पालक। इस कठिन क्षण में अर्जुन अनजाने में उसी ईश्वर को पुकार रहे हैं जो सबका पालन करता है — मानो कह रहे हों कि 'हे प्रभु, तुम सबकी रक्षा करने वाले हो, अब मेरी भी रक्षा करो इस दुविधा से।'