📿 श्लोक संग्रह

गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्

गीता 1.30 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 1 — अर्जुनविषादयोग
गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते ।
न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः ॥
गाण्डीवम्
गाण्डीव धनुष
स्रंसते
गिर रहा है
हस्तात्
हाथ से
त्वक्
त्वचा
एव
भी
परिदह्यते
जल रही है (दाह हो रही है)
न शक्नोमि
समर्थ नहीं हूँ
अवस्थातुम्
खड़ा रहने में
भ्रमति
भ्रमित हो रहा है
मनः
मन

अर्जुन कहते हैं — "गाण्डीव धनुष मेरे हाथ से गिर रहा है, त्वचा में जलन हो रही है, मैं खड़ा भी नहीं रह पा रहा और मेरा मन चक्कर खा रहा है।" वह गाण्डीव जो अर्जुन की पहचान था, जिसे उठाने की शक्ति तीनों लोकों में किसी और में नहीं थी — वही धनुष अब उनके हाथ से फिसल रहा है।

गाण्डीव का गिरना केवल शारीरिक कमज़ोरी नहीं, बल्कि अर्जुन के संकल्प के टूटने का प्रतीक है। एक योद्धा का हथियार उसकी आत्मा का विस्तार होता है — जब आत्मा टूटती है तो हथियार भी साथ छोड़ देता है।

'भ्रमतीव च मे मनः' — मन घूम रहा है, जैसे चक्कर आ रहे हों। यह सबसे गंभीर लक्षण है — शरीर तो कमज़ोर था ही, अब मन भी साथ नहीं दे रहा। अर्जुन पूरी तरह विवश हो गए हैं।

यह श्लोक अर्जुन के शारीरिक-मानसिक पतन की चरम सीमा है। पहले अंग शिथिल हुए, मुँह सूखा, शरीर काँपा, रोंगटे खड़े हुए — और अब धनुष गिर गया, त्वचा जल रही है, खड़े रहने की शक्ति नहीं, मन भ्रमित है।

परंपरा में इस दशा को 'मोह' कहा गया है — जब मनुष्य ममता और आसक्ति से इतना अभिभूत हो जाता है कि उसकी सारी शक्तियाँ निष्क्रिय हो जाती हैं। कृष्ण आगे इसी मोह को तोड़ने का मार्ग बताएँगे।

अध्याय 1 · 30 / 47
← पिछला अध्याय 1 · 30 / 47 अगला →