📿 श्लोक संग्रह

दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण

गीता 1.28 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 1 — अर्जुनविषादयोग
अर्जुन उवाच — दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम् ।
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति ॥
अर्जुन उवाच
अर्जुन ने कहा
दृष्ट्वा
देखकर
इमम्
इन
स्वजनम्
अपने लोगों को
कृष्ण
हे कृष्ण
युयुत्सुम्
युद्ध की इच्छा रखते हुए
समुपस्थितम्
उपस्थित हुए
सीदन्ति
शिथिल हो रहे हैं
गात्राणि
अंग
मुखम्
मुँह
परिशुष्यति
सूख रहा है

अर्जुन कृष्ण से कहते हैं — "हे कृष्ण! अपने ही लोगों को युद्ध के लिए तैयार खड़ा देखकर मेरे अंग शिथिल हो रहे हैं और मेरा मुँह सूख रहा है।" यह अर्जुन के विषाद-भाषण का पहला वाक्य है।

ध्यान दें कि अर्जुन अब 'शत्रु' नहीं कहते, बल्कि 'स्वजन' (अपने लोग) कहते हैं। कुछ क्षण पहले ये सब 'दुर्बुद्धि दुर्योधन के साथी' थे — अब 'अपने' हो गए। यही भावनात्मक बदलाव अर्जुन के विषाद का मूल है।

शरीर के ये लक्षण — अंगों का ढीला पड़ना, मुँह का सूखना — ये गहरे मानसिक तनाव की स्वाभाविक प्रतिक्रिया हैं। जब कोई व्यक्ति बहुत बड़े दुख या आघात से गुज़रता है तो उसका शरीर ऐसा ही व्यवहार करता है।

यह श्लोक अर्जुन के विषाद-प्रकरण का आरंभ है। यहाँ से लेकर अध्याय के अंत तक अर्जुन अपनी पीड़ा, शारीरिक कष्ट और नैतिक दुविधा को एक-एक करके व्यक्त करेंगे। कृष्ण चुपचाप सुनेंगे — उनका उपदेश दूसरे अध्याय से आरंभ होगा।

परंपरा में इस श्लोक को गीता-उपदेश के आरंभिक बिंदु के रूप में भी देखा जाता है — क्योंकि बिना इस विषाद के, कृष्ण का उपदेश कभी होता ही नहीं।

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