📿 श्लोक संग्रह

कैर्मया सह योद्धव्यम्

गीता 1.22 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 1 — अर्जुनविषादयोग
यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान् ।
कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन् रणसमुद्यमे ॥
यावत्
जब तक
एतान्
इन सबको
निरीक्षे
देख लूँ
अहम्
मैं
योद्धुकामान्
युद्ध की इच्छा वालों को
कैः
किन-किन के साथ
मया
मुझे
सह
साथ
योद्धव्यम्
युद्ध करना है
रणसमुद्यमे
इस युद्ध के प्रयास में

अर्जुन अपनी बात आगे बढ़ाते हुए कहते हैं — "मैं देखना चाहता हूँ कि इस युद्ध में मुझे किन-किन के साथ लड़ना है। जो लोग युद्ध की इच्छा से यहाँ आकर खड़े हुए हैं, उन सबको मैं ठीक से देख लेना चाहता हूँ।"

अभी तक अर्जुन के मन में कोई संशय नहीं है। वे एक कुशल योद्धा की तरह सोच रहे हैं — पहले शत्रु को पहचानो, फिर रणनीति बनाओ। यह वैसा ही है जैसे कोई खिलाड़ी मैच से पहले विरोधी टीम के खिलाड़ियों को जानना चाहता है।

लेकिन जो अर्जुन अभी 'शत्रुओं' को देखने निकले हैं, वे जल्दी ही वहाँ शत्रु नहीं, अपने ही गुरु, दादा, मामा और भाई देखेंगे — और तब सब बदल जाएगा।

यह श्लोक पिछले श्लोक (1.21) का ही विस्तार है। दोनों मिलकर अर्जुन का एक ही निवेदन बनाते हैं। कुछ टीकाकार इन दोनों को एक साथ पढ़ते हैं।

कथा की दृष्टि से यह 'शांति से पहले का तूफ़ान' है — अर्जुन अभी शांत और दृढ़ हैं, लेकिन कुछ ही क्षणों में उनका पूरा संसार हिल जाएगा।

अध्याय 1 · 22 / 47
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