📿 श्लोक संग्रह

पाञ्चजन्यं हृषीकेशो

गीता 1.15 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 1 — अर्जुनविषादयोग
पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः ।
पौण्ड्रं दध्मौ महाशङ्खं भीमकर्मा वृकोदरः ॥
पाञ्चजन्यम्
पाञ्चजन्य (कृष्ण का शंख)
हृषीकेशः
श्रीकृष्ण (इन्द्रियों के स्वामी)
देवदत्तम्
देवदत्त (अर्जुन का शंख)
धनञ्जयः
अर्जुन (धन जीतने वाला)
पौण्ड्रम्
पौण्ड्र (भीम का शंख)
दध्मौ
बजाया
महाशङ्खम्
विशाल शंख
भीमकर्मा
भयंकर कर्म करने वाला
वृकोदरः
भीम (भेड़िये जैसे पेट वाला)

अब पाण्डव पक्ष के शंखों के नाम आते हैं। श्रीकृष्ण ने अपना पाञ्चजन्य शंख बजाया — यह शंख पञ्चजन नामक दैत्य को मारकर प्राप्त किया गया था। अर्जुन ने अपना देवदत्त शंख बजाया — यह देवताओं द्वारा प्रदान किया गया दिव्य शंख था।

भीम ने अपना पौण्ड्र नामक महाशंख बजाया। भीम को यहाँ दो विशेषणों से पुकारा गया है — "भीमकर्मा" अर्थात भयंकर कार्य करने वाला, और "वृकोदर" अर्थात भेड़िये जैसे पेट वाला। भीम अपनी अपार शारीरिक शक्ति और भूख दोनों के लिए जाने जाते थे।

तीन शंखों की ध्वनि — पाञ्चजन्य, देवदत्त और पौण्ड्र — यह पाण्डव पक्ष के तीन सबसे शक्तिशाली योद्धाओं का परिचय है। कृष्ण भगवान हैं, अर्जुन सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर हैं, और भीम सबसे बलवान योद्धा। इन तीनों के शंखनाद से कौरव सेना में कम्पन हो गया होगा।

प्राचीन भारत में प्रत्येक महान योद्धा के पास अपना विशेष शंख होता था। शंख का नाम लेकर बजाना एक प्रकार की घोषणा थी — "मैं यहाँ हूँ, युद्ध के लिए तैयार हूँ।"

"हृषीकेश" कृष्ण का वह नाम है जिसका अर्थ है इन्द्रियों के स्वामी। यह नाम यहाँ विशेष है क्योंकि आगे चलकर गीता में कृष्ण अर्जुन को इन्द्रियों पर नियंत्रण का ही उपदेश देंगे।

अध्याय 1 · 15 / 47
← पिछला अध्याय 1 · 15 / 47 अगला →