कौरव पक्ष के शंखनाद के उत्तर में पाण्डव पक्ष से भी शंखध्वनि हुई। सफ़ेद घोड़ों से जुड़े विशाल रथ पर श्रीकृष्ण (माधव) और अर्जुन (पाण्डव) विराजमान थे। दोनों ने अपने-अपने दिव्य शंख बजाए।
यह दृश्य बहुत भव्य है — श्वेत अश्वों से सजा विशाल रथ, उस पर स्वयं भगवान कृष्ण सारथी के रूप में और महान धनुर्धर अर्जुन योद्धा के रूप में। "दिव्यौ शङ्खौ" — दोनों के शंख साधारण नहीं थे, अलौकिक थे। कृष्ण का शंख पाञ्चजन्य और अर्जुन का शंख देवदत्त — दोनों के नाम अगले श्लोक में आते हैं।
ध्यान दीजिए कि कौरव पक्ष के वर्णन में "तुमुल" (भयंकर कोलाहल) शब्द आया था, लेकिन कृष्ण-अर्जुन के शंख को "दिव्य" कहा गया। यह अन्तर महत्वपूर्ण है — एक पक्ष में कोलाहल है, दूसरे में दिव्यता।