भीष्म पितामह के शंख बजाते ही कौरव सेना में एक साथ सैकड़ों वाद्य बज उठे — शंख, नगाड़े, ढोल, मृदंग और तुरहियाँ। उनकी सम्मिलित ध्वनि इतनी भयंकर थी कि पूरा कुरुक्षेत्र गूँज उठा।
कल्पना कीजिए उस दृश्य की — विशाल मैदान में लाखों सैनिक खड़े हैं, और अचानक सैकड़ों वाद्ययंत्र एक साथ बज उठते हैं। वह ध्वनि आकाश को चीर देने वाली रही होगी। यह शब्द "तुमुल" — अर्थात भयानक कोलाहल — से वर्णित किया गया है।
प्राचीन काल में युद्ध के पहले वाद्य बजाने की परम्परा थी। इससे सैनिकों का मनोबल बढ़ता था और शत्रु के मन में भय उत्पन्न होता था। कौरव सेना ने अपनी शक्ति का प्रदर्शन इस भयंकर ध्वनि से किया।