दुर्योधन की बात सुनकर कुरुवंश के वृद्ध पितामह भीष्म ने दुर्योधन को प्रसन्न करने के लिए सिंह की भाँति गर्जना की और ज़ोर से अपना शंख बजाया। भीष्म का यह शंखनाद युद्ध के आरम्भ का संकेत था।
भीष्म पितामह को "प्रतापवान्" कहा गया है — अर्थात अत्यन्त तेजस्वी और प्रतापी। उनकी आयु बहुत अधिक थी, फिर भी उनका पराक्रम किसी युवा से कम नहीं था। सिंहनाद करके शंख बजाना — यह पुरानी परम्परा थी कि सेनापति युद्ध की शुरुआत का संकेत शंखध्वनि से देता था।
"तस्य सञ्जनयन्हर्षम्" — दुर्योधन का हर्ष बढ़ाने के लिए। भीष्म ने यह काम दुर्योधन के मनोबल के लिए किया। एक बुज़ुर्ग का अपने पोते को आश्वस्त करना — इसमें स्नेह भी है और कर्तव्य भी, भले ही भीष्म जानते थे कि इस युद्ध का परिणाम अच्छा नहीं होगा।