📿 श्लोक संग्रह

तस्य सञ्जनयन्हर्षम्

गीता 1.12 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 1 — अर्जुनविषादयोग
तस्य सञ्जनयन्हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः ।
सिंहनादं विनद्योच्चैः शङ्खं दध्मौ प्रतापवान् ॥
तस्य
उसके (दुर्योधन के)
सञ्जनयन्
उत्पन्न करते हुए
हर्षम्
हर्ष (प्रसन्नता)
कुरुवृद्धः
कुरुवंश के वृद्ध
पितामहः
पितामह (भीष्म)
सिंहनादम्
सिंह की गर्जना
विनद्य
गरजकर
उच्चैः
ज़ोर से
शङ्खम्
शंख को
दध्मौ
बजाया
प्रतापवान्
प्रतापी

दुर्योधन की बात सुनकर कुरुवंश के वृद्ध पितामह भीष्म ने दुर्योधन को प्रसन्न करने के लिए सिंह की भाँति गर्जना की और ज़ोर से अपना शंख बजाया। भीष्म का यह शंखनाद युद्ध के आरम्भ का संकेत था।

भीष्म पितामह को "प्रतापवान्" कहा गया है — अर्थात अत्यन्त तेजस्वी और प्रतापी। उनकी आयु बहुत अधिक थी, फिर भी उनका पराक्रम किसी युवा से कम नहीं था। सिंहनाद करके शंख बजाना — यह पुरानी परम्परा थी कि सेनापति युद्ध की शुरुआत का संकेत शंखध्वनि से देता था।

"तस्य सञ्जनयन्हर्षम्" — दुर्योधन का हर्ष बढ़ाने के लिए। भीष्म ने यह काम दुर्योधन के मनोबल के लिए किया। एक बुज़ुर्ग का अपने पोते को आश्वस्त करना — इसमें स्नेह भी है और कर्तव्य भी, भले ही भीष्म जानते थे कि इस युद्ध का परिणाम अच्छा नहीं होगा।

यह श्लोक युद्ध के आरम्भ का दृश्य प्रस्तुत करता है। भीष्म का शंखनाद कौरव पक्ष से पहला संकेत है। इसके बाद कौरव सेना में अनेक वाद्य बजते हैं, और फिर पाण्डव पक्ष से कृष्ण और अर्जुन अपने दिव्य शंख बजाते हैं।

भीष्म के भीतर एक द्वन्द्व था — वे जानते थे कि धर्म पाण्डवों के पक्ष में है, फिर भी अपनी प्रतिज्ञा के कारण कौरवों की ओर से लड़ रहे थे। यह महाभारत की सबसे करुण विडम्बनाओं में से एक है।

अध्याय 1 · 12 / 47
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